
हनुमान चालीसा आरंभ होने से पहले तुलसीदास जी दो दोहे कहते हैं। दूसरा दोहा वह है जिसमें वे स्वयं को बुद्धिहीन कहकर हनुमान जी से बल, बुद्धि और विद्या माँगते हैं।
दोहा २ का मूल पाठ
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस बिकार॥
Buddhiheen tanu janike, sumiro Pavan-Kumar;
Bal, buddhi, vidya dehu mohe, harahu kalesh vikar.
अर्थ (Hindi Meaning)
अपनी अल्प बुद्धि समझकर पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ; मुझे बल, बुद्धि और विद्या दें और कष्ट-विकार दूर करें।
Meaning in English
Knowing my intellect to be limited, I remember Hanuman, son of the Wind. Grant me strength, wisdom, and knowledge; remove my afflictions and faults.
शब्द-दर-शब्द अर्थ (Word by Word Meaning)
| शब्द | उच्चारण | अर्थ |
|---|---|---|
| बुद्धिहीन | Buddhiheen | बुद्धि से रहित, अल्पबुद्धि |
| तनु | Tanu | शरीर, स्वयं |
| जानिके | Janike | जानकर, समझकर |
| सुमिरौं | Sumirau | स्मरण करता हूँ |
| पवन-कुमार | Pavan-Kumar | पवन के पुत्र, हनुमान जी |
| बल | Bal | शक्ति |
| बुद्धि | Buddhi | विवेक, समझ |
| विद्या | Vidya | ज्ञान |
| देहु मोहि | Dehu mohi | मुझे दीजिए |
| हरहु | Harahu | हर लीजिए, दूर कीजिए |
| कलेस | Kalesh | कष्ट, क्लेश |
| बिकार | Vikar | दोष, विकार |
इस दोहे का भाव
यह दोहा कहने वाले तुलसीदास हैं, रामचरितमानस के रचयिता। और वे स्वयं को ‘बुद्धिहीन’ कह रहे हैं।
यही इस दोहे का मर्म है। चालीसा आरंभ होने से ठीक पहले रखा गया यह वाक्य बताता है कि इस पाठ में प्रवेश का द्वार विनम्रता है, विद्वत्ता नहीं। जो स्वयं को पहले से पूर्ण मानता है, उसके पास माँगने को कुछ बचता ही नहीं।
ध्यान दीजिए कि माँग क्या है। बल, बुद्धि, विद्या। धन या सिद्धि नहीं। और अंत में एक और प्रार्थना: कष्ट और विकार दूर हों।
Why devotees begin here
Tulsidas, author of the Ramcharitmanas, opens by calling himself buddhiheen, without intellect.
That is the point. This doha sits immediately before the Chalisa proper, and it sets the terms of entry: humility, not scholarship. Someone who arrives already complete has nothing left to ask for.
Notice what is actually requested: strength, discernment, knowledge. Not wealth, not powers. And then one more thing: that affliction and inner disorder be taken away.
कब पढ़ा जाता है यह दोहा
यह दोहा हनुमान चालीसा के प्रत्येक पाठ से पहले पढ़ा जाता है। विद्यार्थी और परीक्षा देने वाले इसे अलग से भी दोहराते हैं, क्योंकि इसमें बुद्धि और विद्या की सीधी याचना है।
सामान्य प्रश्न (FAQ)
क्या चालीसा से पहले दोनों दोहे पढ़ना आवश्यक है?
परंपरा में दोनों आरंभिक दोहे पढ़े जाते हैं, किंतु श्रद्धा मुख्य है। समय कम हो तो भी भाव समझकर पढ़ना श्रेष्ठ माना गया है।
तुलसीदास जी ने स्वयं को बुद्धिहीन क्यों कहा?
यह आत्म-निंदा नहीं, विनम्रता की परंपरा है। भक्ति साहित्य में रचनाकार स्वयं को छोटा कहकर इष्ट की महिमा बड़ी करता है।
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